Sunday, August 19, 2007

गैर-दृश्‍य स्‍मृति

कल का प्रथम एसाइनमेंट था-

अनुभव को अपनी इंद्रियों के अनुसार दृश्‍य तथा गैर दृश्‍य में बांट सकने में सक्षम होना

इसके लिए आपको सुझाई गई गतिविधि कि आप अपनी किसी रोजमर्रा की गतिविधि मसलन कॉलेज में प्रवेश करना, फिर कैंटीन या कॉमन रूम जाना पर पुन: विचार करें तथा उसका नरैशन प्रस्‍तुत करें किंतु इस बात का ध्‍यान रखें कि आपका नरैशन गैर दृश्‍य हो यानि अपने अनुभव क ेवर्णन से उन बातों को हटा दें जो दृश्‍यात्‍मक हैं।

 

जाहिर सा सवाल यह है कि रचनात्‍मक लेखन के लिए इस प्रकार की गतिविधि का उपयोग क्‍या है ?

 इस गतिविधि से आपको सर्वप्रथम तो यह पहचानने में मदद मिलेगी कि हमारे अनुभव व स्‍मृति के अधिकांश अंश दृश्‍यात्‍मक ही हैं, यह आश्‍चर्यजनक है कि हम पांच इंद्रियोंसे अनुभव प्राप्‍त करते हैं किंतु इसके बीच का आवंटन बराबरी का नहीं है- हमारे अनुभव 95 प्रतिशत तक दृश्‍यात्‍मक होते हैं तथा शेष ध्‍वन्‍यात्‍मक, कुन अनुभवों में  स्‍पर्श,  गंध व स्‍वाद का अनुपात नगण्‍य है। यानि स्‍मृति व अनुभव के मामले में ऐंद्रिय-लोकतंत्र नदारद होता है :)

इस तरह की गतिविधि आपको अपने वर्णनों में गैर दृश्‍य को भी प्रतिनिधित्‍व के प्रति सचेत बनाएगी। साथ ही आप विकलांगता के आयाम के प्रति भी संवेदनशील अनुभव करेंगे।

जो फीडबैक आपसे मिला है, मैं उससे प्रसन्‍न हूँ।

2 comments:

अरुण said...

बधाई जी बहुत दिन बाद आप ने कुछ लिखा तो सही

Udan Tashtari said...

एकाध पैरा का उदाहरण भी देते तो अच्छा रहता.